बुधवार, फ़रवरी 16, 2005

विद्यार्थियों का जीवन

विद्यार्थियों का जीवन मुश्किल है। जब मैंने ग्रैजुएट के स्कूल जाने पर निश्चय किया तब मुझे मालूम था कि बहुत कठिनाइयाँ होती। आवेदन-पत्र भरने के दौरान मैंने अपनी पत्नी को विस्तार से यह बातें समझाने की कोशिश की मानो मुझे ख़ुद यह बातें समझी। कितना दूध पीना बच्चा मैं था! उस समय हमको मालूम नहीं था कि कभी कभी जैसा अग्नि-परीक्षा हमारी ज़िन्दगी लगती होती।

पहले मैंने आवेदन-पत्र भेजकर जवाब का इन्तज़ार किया। लम्बे समय तक मैं जवाब का इन्तज़ार कर रहा था और रात-दिन मेरी चित्त अशांत हो जाता था। मुझे संदेह हो रहा था कि मुझे तो वे नहीं मागते होते। जब तक मैं रोना चाहता था तब तक जवाब आया। ज़मीन पर पाँव नहीं रखा था! लेकिन उस के बाद भी मुझे समझा कि मेरी परेशानियों की चरम सीमा नहीं था। पेपरज़, परीक्षाएं, ग्रेडज़, और मैस्टर का थीसिस - अरे बाब रे इनतना काम है! लेकिन मैं अभी तक यहाँ हूँ। क्या मैं तो पागल हूँ?

1 Comments:

Blogger आलोक said...

ऐश करनी हो तो हिन्दुस्तानी कॉलेज में पढ़िये। सारे साल फ़िल्में देखिये, इम्तिहान के पन्द्रह दिन पहले घोटा लगा के पास होइए, टाई पहन के इण्टर्व्यू दीजिए और फिर शुरु कर दीजिए नोट छापने।

9:30 am  

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