गुरुवार, फ़रवरी 24, 2005

इतनी भूख, बाप रे बाप

आज सुबह चारपाई से उठकर मैं तुरन्त नाश्ता करना चाहता था। भूख के मारे मेरी आँते कुलकुला रही थीं। खाने का समय था नहीं क्योंकि अगर मैं नाश्ता करता तो हिन्दी क्लास देर से पहुँचता। जल्दी से कपड़े पहनकर, लपककर मैं घर से साईकल पर निकला। मुझे इतनी भूख लग रही थी। लेकिन मैं केला तक नहीं लाया था। जब देर से हिन्दी क्लास में पहुँचा, तब मैंने पाया कि पूरे दो घंटे मुझे भूख सहनी पड़ेगी। जब हम आपस में हिन्दी में बातचीत कर रहे थे उस दौरान मेरा पेट कुलकुला रहा था और तरह तरह के शोर मचा रहा था। उस वक्त स्काट जो मेरे सामने बैठा हुआ था मैं उससे कुछ बातें कर रहा था। उसने मेरी बात काटकर मुझे पूछा कि ये गुड़गुड़ाहट की आवाज़ कहाँ से आ रही है? मैंने उससे पूछा - कौनसी आवाज़? तभी फ़िर मेरा पेट और जोर से गुड़गुड़ाया। मुझे उस आवाज़ पर शर्म महसूस हुई और मैं सच कहता हूँ कि मैं उस आवाज़ को छिपाना चाहता था। उस समय मिकेला ने मुझे एक मिठाई दी । "अरे यह लो। मैंने तुम्हारे पेट की आवाज़ सुनी। अगर विजयजी कुछ कहेंगे तो मैं तुमको मिठाई देने का खून अपने सिर पर ले लूँगी, अच्छा?" मैंने सोचा कि इसमें हरज क्या है और आनन्द से मैंने मिठाई खाई।

2 Comments:

Blogger Vijay Thakur said...

अच्छा तो आपलोगों ने चुपके चुपके क्लास में मिठाई भी खा ली और मुझे पता तक नहीं चला । ख़ैर, अगली बार से मेरा भी खयाल भी रखियेगा, मेरा पेट तो हमेशा गुड़गुड़ाता रहता है।

7:58 pm  
Blogger प्रेम पीयूष said...

जमीनी बातों की कृतियों का अपना अलग ही आनंद है ।

6:16 pm  

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