Alone in the forest (part 1)
अकेला वन में
जब मैं बच्चा था - दस-ग्यारा साल का - तब मुझे कभी-कभी वन में घूमने का शौक़ था। मैं अक्सर अकेला कई घंटों के लिए लम्बी सौर करता था चाहे मिझे अच्छा मालूम था कि कुछ खतरा हो सकता।
एक दिन मैंने माँ-बाप जी को कहा कि वन जाने की इजाज़त दीजिए। आम तोर पर वे कहते थे - हाँ, ज़रूर बेटा, मज़ा करो! लेकिन उस दिन उनने कहा कि आज नहीं, फ़िर किसी दिन पर रखो। मुझे बहुत निराशा हुआ सो माँ-बाप जी को बिना कहने चुपके से घर से निकला। मैं जल्दी से वन में गया।
पेड़ों आपस में मैं इधर-उधर घूमता था। जहाँ मैंने चींटियों, चिड़ियाओं, और हिरनों देखा था वहाँ मैंने बहुत बहुत मज़ा किया था। मिझे उतना मज़ा आने के मारे मैं बेसोचे गहरा और गहरा वन में गया। मुझे उतना और मज़ा आने के मरे मैंने एक साइन जो कहता था "कुत्ता से सावधान!" उसके पर धयान नहीं तक दिया।
To be continued...

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