बुधवार, मार्च 02, 2005

My brain hurts

मेरे दिमाग़ में दर्द है

मैं इतना बड़ा मूर्ख था! लेकिन आपको मुझे कहना चाहिए कि मेरा दोष नहीं था। मैं कहता हूँ कि आगर मैं उसकी बात का बस चलता था तो मैं अलग तरीक़ा करता था। अच्छा, शुरू से ही आप लोगों को समझाऊँगा। एक दोपहर को मैं घर में अपने डेस्क के पास बैठकर हिन्दी जर्नल जोश से लिख रहा था। मालूम है कि कभी कभी मैं देर से जर्नल देता हूँ सो उस हफ़ते मैं जल्दी खत्म कर चाह रहा था। आसान बात है न? खैर मैंने जर्नल खत्म कर लिया, दुसरे पेपरज़ों के साथ अपने फ़ोल्डर में रख दिया, और क्लास जाने लगा। जब जब मैं अपने घर में हूँ, होशियार हो सकता हूँ लेकिन जहाँ मैं इस क्लास में था वहाँ तो मैंने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं किया। इस क्लास खत्म होकर मैं फ़ोल्डर हाथ में मैं विजयजी के दफ़्तर जल्दी से गया। मुझे अन्त में समय पर जर्नल देने पर बहुत गर्व था। लेकिन जब मैं दफ़्तर आया तब मुझे समझ लिया कि पिछले क्लास में मैं दुसरे पेपर के साथ ग़लती से दे चुका। क्या करूँ? पेपर लिखा हुआ था, समय पर खत्म हुआ था, केवल मेरे साथ नहीं था। आज-कल मैं सिर्फ़ आन-लाइन पर अपना हिन्दी जर्नल लिखूँगा। इसी तरह मेरे निर्बल दिमाग़ के लिए ज़्यादा सरल होगा।