बुधवार, मार्च 16, 2005

अकेला वन में (part 2)

अकेला वन में
(part 2)

अचानक मेरे पर किस जानवर ने ग़ुर्राया। मेरे पिछे नज़र डालते हुए मैंने एक बड़े भैंकते कुत्ते को देखा। वह सिधे मेरी ओर दोड़ रहा था। ज़ोर से चीख़ते हुए मैंने जल्दी से पेड़ पर चढ़ा। कुत्ता बहुत ग़ुस्सा हुआ और छोड़ना नहीं चाहता था सो वहीं रात-दिन भर मैं रह पड़ा था। जहाँ मैं था किसको मालूम नहीं था। मैं अकेला रोया जबा तक मुझे नींद आई।

सुबह जब मैं उठा तब कुत्ता नहीं था। उसकी जगाह मेरे पिता जी पेड़ के नीचे मेरा इन्तज़ार कर रहे थे। उनसे मुझे उतरने का आदेश दिया लेकिन मैं डरा कि वे मुझसे नाराज़ हुए। हर हालत में मैं पेड़ से उतरा। उनके सामने खड़ा हुआ मैंने अपने पिता जी को सब कहानी समझाई - वन में घूमने के शौक के बारे में, जानवरों के बारे में, और ज़रूर बड़े गुस्से हुए कुत्ते के बारे में - और उनसे माफ़ी माँगी। कई लम्बे सेकन्डज़ के बाद उनने मुस्कराया। आँख मारते हुए उनने मुझे प्यार से कहा - मैं सुखी हूँ क्योंकि तू अभी तक ज़िन्दा है। हम साथ साथ घर चल गए।

1 Comments:

Blogger Jyoti Bothra said...

Shukriya Vijayji!!!!

8:16 am  

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