अकेला वन में (part 2)
अकेला वन में
(part 2)
सुबह जब मैं उठा तब कुत्ता नहीं था। उसकी जगाह मेरे पिता जी पेड़ के नीचे मेरा इन्तज़ार कर रहे थे। उनसे मुझे उतरने का आदेश दिया लेकिन मैं डरा कि वे मुझसे नाराज़ हुए। हर हालत में मैं पेड़ से उतरा। उनके सामने खड़ा हुआ मैंने अपने पिता जी को सब कहानी समझाई - वन में घूमने के शौक के बारे में, जानवरों के बारे में, और ज़रूर बड़े गुस्से हुए कुत्ते के बारे में - और उनसे माफ़ी माँगी। कई लम्बे सेकन्डज़ के बाद उनने मुस्कराया। आँख मारते हुए उनने मुझे प्यार से कहा - मैं सुखी हूँ क्योंकि तू अभी तक ज़िन्दा है। हम साथ साथ घर चल गए।

1 Comments:
Shukriya Vijayji!!!!
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