बुधवार, अप्रैल 13, 2005

नियति की जर्नल #3

नियति की जर्नल #3 05/04/2005

मुझे मालूम नहीं है। हर दिन मेरा जीवन और जटिल हो रहा है। मौसम बहुत अच्छा है, लेकिन मुझे खुशी नहीं है। मुझे लगता है कि जब मौसम गरम और धूप-भरा है, तब सब लोगों को खुश हों। पिछला हफ़ते मैं किसी से मिली, और वह बहुत अच्छा और रूपवान आदमी है। मगर उसी समय इस हफ़ते के दौरान मेरा एक्स-प्रेमी मेरे घर पर आने रहता है। यह बहुत मुशकिल मेरे लिये क्योंकि मैं उस से कहना चाहिती हूँ। अंत में कल मैं ने द्वार खोला और हम चार ंघट के लिये बताये। साफ़-साफ़ रात भर वह मुझे माफ़ करने रहते है, और वह मुझे उसके बहाने दिये। अब मुझे मालूम नहीं।

1 Comments:

Blogger Pratik said...

आपकी दिक्‍कत तो वाकई बड़ी जटिल है, लेकिन मेरी समझ में कुछ कम ही आया कि आप कहना क्‍या चाहती हैं। :)

12:46 pm  

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